संदेश

यादें...

तुमसे भली याद है तुम्हारी, हौले से आकर महका जाती है, मुलायम, मनभावन,  जब छूती है मुझे, सभी वेदनाओं से मुक्त, उस एक पल में ठहर जाती हूं, यादें भी टाइम मशीन होती हैं, जी चुके पल तक फिर पहुंचा देती हैं, उमंगित-तरंगित उस पल को फिर से जी उठती हूं, नित भोर सी निश्छल "याद", और उसमें समाये, बस "तुम", यही वो समय है, जो "हमारा" है।  © #पंक्ति #श्वेता

अच्छी हो...

अच्छी हो, क्योंकि चुप रहती हो, नहीं करती प्रश्न, क्रोध आता ही नहीं, मुस्कुराती रहती हो, सबको खुश रखती हो, खयाल रखना आता है तुम्हें, जिम्मेदार हो, सोचती हूं तुम्हें, फिर प्रश्न करती हूं, क्या तुम मनुष्य हो? या ईश्वरत्व को प्राप्त हो चुकी हो, इस "अच्छे" के लिए कितना कुछ "छोड़ा" होगा, मन को कितना संभाला-समझाया होगा, हूंक सी उठती है, फिर चुप हो जाती हूं, मैं, तुम-सी "अच्छी" जो नहीं।  © #पंक्ति #श्वेता

प्रेम का हासिल

हम मिले,  प्रेम हुआ, बिछोह नियति थी, मिलना तय था, साथ चलना नहीं, एक-दूजे के पूरक थे हम, फिर भी प्रेम की भांति अधूरे रहे, कुछ अनकहे-अनसुने रहे, हां, अब न मिलना होगा तुमसे, लेकिन इतना तय है, तुम्हारे मन के किसी कोने में स्मृति बन रहूंगी, मेरी यादों को जब बुनोगे, तो मुस्कुरा दोगे, बस यही हासिल तो है मेरे प्रेम का,

माफी

कई बार मांगी है माफी, किसी को लगी ठेस, कभी हुई कोई भूल, वजह, बेवजह ही मांग लेती हूं, कभी दोस्तों से, कभी अपनों से और कई बार अजनबियों से भी, माफी मांगने की इस कड़ी में खुद को अनदेखा किया, नहीं मांगी कभी खुद से माफी, अपने सपनों की कली को खिलने से पहले तोड़ने की माफी, औरों के लिए बोलती रही खुद के लिए चुप्पी साधने की माफी, अपना मन-समय उन्हें देने के लिए, जिन्हें कभी कद्र नहीं थी, तो सुनो "स्व" तुमसे मांगती हूं माफी, अब से स्वयं को रखूंगी पहले, लड़ूंगी खुद के लिए, अपने सपनों के लिए, और अपने आत्मसम्मान के लिए। © #पंक्ति #श्वेता

वो तुम ही हो ...

वो तुम हो जिसकी कोख में की हलचल, हृदय पर अंकित हुई, वो तुम ही हो, जिसकी "किक्स" ने सिर्फ मुझे नहीं, मेरी आत्मा के भीतर तक को जगाया, वो तुम ही हो, जो मेरे भीतर आकार लेती रहीं,  और बाहर से कुछ-कुछ मैं भी पनपती रही, वो तुम ही हो, जिसका अजनबी अस्तित्व भी, जन्म-जन्मांतर का साथ होने की गवाही देता रहा, वो तुम ही हो, जिसने बताया कि मेरी देह कितनी करिश्माई है,  जिसमें एक नये शख्स को गढ़ने की क्षमता है, वो तुम ही हो, जिसको देख कर मेरी धड़कनें तेज हो गईं थी,  और सांस लेना भूल ही गई, वो तुम ही हो, जिसने बताया कि प्रेम में, मैं कितनी गहरी उतर सकती हूं, वो तुम ही हो,  जिसने इस संसार का सबसे सुंदर रिश्ता मुझे दिया, तुमने "मां" कहा और मैं पिघल कर आंखों से झरने लगी,  वो तुम ही हो, जो एक पल में मुझे आत्मविश्वास से भर देती हो, और अगले पल कई सारी आशंकाओं से घिर जाती हूं,  तुम आईं, बहुत कुछ बदला,  लेकिन सबसे ज्यादा मैं बदली। 

तुम आओगे क्या?

मैं बहुत टूट चुकी हूं, टूट के बिखर गई हूं, सुनो तुम आओगे क्या, मेरी किरचनों को समेटने, उन्हें फिर से जोड़ोगे क्या, पहले की तरह मुझे बना पाओगे, मेरे अक्स पर उभरीं जुड़ी लकीरों को सजाओगे, थाम कर फिर से खड़ा कर पाओगे, सुनो क्या तुम आओगे?

मुलाकात और वादा

कई दिनों बाद आज मुलाकात तय हुई थी। चैटिंग, कॉलिंग का एक लंबा दौर चलने के बाद मिलने की योजना बनी। सोशल नेटवर्किंग साइट पर हुई दोस्ती अमूमन उतनी विश्वसनीय नहीं मानी जाती। लिहाजा, एक-दूजे को समझने के बाद भी "कुछ" बाकी रह गया। दोस्ती से मामला पसंदीदगी तक पहुंच गया था, लेकिन मुकम्मल होना बाकी था। कई बार आगे की जिंदगी की प्लानिंग हो चुकी थी, लेकर मुलाकात बाकी थी। आज बस वही मुलाकात होनी है। कैफे कॉफी डे को चुना गया। दोनों एकांत या प्राइवेसी नहीं चाहते थे।  तय समय पर मिले। आमने सामने पहली मुलाकात थी। दोनों में झिझक थी। धीरे-धीरे सब नॉर्मल हुआ। चोर नजरों से उसे देखता, जब पकड़ा जाता तो उंगलियों से भौंहे संवारने लगता। इस बार उसे घूरते हुए बोली, "क्या है? नॉर्मल  नहीं रह सकते।"  "क्या करूं तुम तस्वीर से ज्यादा सुंदर हो। काश कि मैं भी गा पाता, तो अभी गाने लगता।" हंसते हुए कहता है। आंखे  तरेरते हुए कहती है, "हो गया मजाक, तो कुछ कायदे की बात हो जाए?" "क्या हम पॉलिटिक्स पर चर्चा करने वाले हैं?" माथे पर सिकन लाते हुए पूछा। तकरीबन घूरते हुए बोली, "न...