अच्छी हो...
अच्छी हो,
क्योंकि चुप रहती हो,
नहीं करती प्रश्न,
क्रोध आता ही नहीं,
मुस्कुराती रहती हो,
सबको खुश रखती हो,
खयाल रखना आता है तुम्हें,
जिम्मेदार हो,
सोचती हूं तुम्हें,
फिर प्रश्न करती हूं,
क्या तुम मनुष्य हो?
या ईश्वरत्व को प्राप्त हो चुकी हो,
इस "अच्छे" के लिए कितना कुछ "छोड़ा" होगा,
मन को कितना संभाला-समझाया होगा,
हूंक सी उठती है,
फिर चुप हो जाती हूं,
मैं, तुम-सी "अच्छी" जो नहीं।
©
#पंक्ति #श्वेता
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