प्रेम का हासिल
हम मिले,
प्रेम हुआ,
बिछोह नियति थी,
मिलना तय था,
साथ चलना नहीं,
एक-दूजे के पूरक थे हम,
फिर भी प्रेम की भांति अधूरे रहे,
कुछ अनकहे-अनसुने रहे,
हां, अब न मिलना होगा तुमसे,
लेकिन इतना तय है,
तुम्हारे मन के किसी कोने में स्मृति बन रहूंगी,
मेरी यादों को जब बुनोगे, तो मुस्कुरा दोगे,
बस यही हासिल तो है मेरे प्रेम का,
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