तुम आओगे क्या?
मैं बहुत टूट चुकी हूं,
टूट के बिखर गई हूं,
सुनो तुम आओगे क्या,
मेरी किरचनों को समेटने,
उन्हें फिर से जोड़ोगे क्या,
पहले की तरह मुझे बना पाओगे,
मेरे अक्स पर उभरीं जुड़ी लकीरों को सजाओगे,
थाम कर फिर से खड़ा कर पाओगे,
सुनो क्या तुम आओगे?
' property='article:author'/>
सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें