संदेश

लाल डायरी के नीले हर्फ़ !

कुशल नटनी-सी अपने काम में जुटी हुई शुभ्रा का दिन सबसे पहले आता है और रात सबसे आख़ि‍र में उसे नसीब होती है। कहने को वो सिर्फ़ ‘गृहणी’ है। यह  शब्द भी क्या ख़ूब है?... 'जिम्मेदारी' महज एक लफ़्ज़ है या उससे कुछ ज़्यादा। इसका अंदाज़ा तो जिम्‍मेदारियों को ढ़ोने वाला ही बता सकता है। सभी के हिस्‍से यह शब्‍द 'जिम्‍मेदारी' आता ही है। कोई जिम्‍मेदारी निभाता भर है और किसी की ज़ि‍ंदगी जिम्‍मेदारियों में ही गुजर जाती हैं। उन्‍हीं लोगों में आती है शुभ्रा। शुभ्रा, एक गृहणी है। घर संभालने से लेकर रिश्तों को सहेजना, सब कुछ उसके जिम्मे आता है। इस जिम्मेदारी को बिना किसी शि‍क़ायत के बीते बीस सालों से निभा रही है। हां, कभी-कभी माता जी का झुर्रियों भरा हाथ शुभ्रा के सिर पर जाता है और दुलारते हुए कहती हैं, “तू तो मेरी लक्ष्मी है। मेरे परिवार की बगिया को तूने महका रखा है। एकदम कुशल गृहणी है री तू तो”। माता जी के इस आशीष में पिता जी भी सहभागी बन जाते थे। झट से अपना बखान करते हुए कहते, “आख़ि‍र पसंद किसकी थी। मैंने ही तो शुक्ला जी से शुभ्रा का हाथ मांगा था, गुड्डू के लिए”। तारीफ़ की इतनी-सी...

वापसी

आज वापसी हुई थी, एक उजास की, संकल्प की और शक्ति की। घनघोर अंधेरे के बाद दमकते सबेरे का प्रकाश फैला था चारों ओर। एक नए सफर की, एक अदम्य चाह की वापसी हुई थी। अलार्म बजा और शालिनी ने उसे धीरे से चुप कर दिया। सुबह, जाने कैसी सुबह...? खैर, सूरज निकल ही आया है। और शायद इसे ही सुबह कहा जाता है। सो, शालिनी की भी सुबह हो ही गई है या सिर्फ उजाला हुआ है, सुबह तो शायद बाकी है। खैर, अलार्म बंद करके शालिनी ने जल्दी से किचन को सम्भालना शुरू किया। बाकी दिनों के मुकाबले आज कुछ ज्‍यादा ही फुर्ति दिखाने की कोशिश कर रही थी। बहुत अहम काम जो उसे आज निबटाना है। निबटाना, कैसा अजीब-सा शब्द है। क्या-क्या और कैसे-कैसे निबटाना पड़ता है। कुछ सम्भालने और बचाने के लिए, कुछ फेंकना पड़ता है। वह भी कुछ ऐसा ही करने जा रही थी। माता-जी ने पूजा-पाठ करके डायनिंग टेबिल पर आसन जमा लिया है। वहीं पास में पिताजी भी हिन्दी का अखबार लिए बैठे हैं। 'अरे! शालू जल्दी से चाय नाश्ता लगा दो। वरना तुम्हारे ससुर जी आज मुंह दिखाई नहीं करेंगे। माता जी कुछ भौंहे चढ़ाते हुए बोलीं। 'बाकी नाश्ता रख दिया है मम्मी जी, सिर्फ दूध और गर्म कर ...

अलहदा रिश्ता

रिश्तों में दोस्ती को सबसे खास माना जाता है, क्योंकि यही तो वह रिश्ता जिसे हम बनाते हैं। अपनी पसंद से और मजबूरी से।  आज काफी दिनों के बाद शर्मा जी के चेहरे पर मुस्कान देखी। अच्छा लगा। कितनी मासूम मुस्कान है उनके चेहरे पर। बीते दो सालों से जैसे वह मुस्कान कहीं गुम ही हो गई थी। मुस्कान खोने की वजह भी तो थी। दो वर्ष पूर्व ही तो सुचेता जी उन्हें अकेले छोड़कर चली गई थीं। सुचेता शर्मा, संजय शर्मा की धर्मपत्नी थीं।  शासकीय कॉलेज में लेक्चरर थे और सुचेता जी उनकी गृहस्वामिनी। मिस्टर और मिसेज शर्मा के दो बच्चे थे, मल्लिका और संस्कार। मल्लिका बड़ी थी, सो उसकी शादी तीन वर्ष पूर्व ही मरीन इंजीनियर से कर दी गई थी। बड़ी धूम-धाम से शादी हुई थी। शादी के हर फंग्शन में शर्मा जी, सुचेता जी को ज़ोहरा ज़बी बुलाते थे, उसे देखकर तो नया-नवेला जोड़ा भी शरमा जाए। शर्मा जी के छेड़ पर, सुचेता जी की हया से उनके चेहरे पर बिखर जाने वाली गुलाबी रंगत किसी नवयुवती को भी शर्मसार कर जाए। रिवाज़ पूरे हुए, बेटी विदा हो गई। जि़ंदगी चलती रही, पर सुचेता जी और शर्मा जी के रिश्ते की गर्माहट इस उम्र में भी पहले की ही मान...

Bachapan

बचपन  कहीं से कोई मेरा बचपन ला दे, पिछले चौराहे की दूसरी मोड़ वाली गली पर है शायद, यूँ ही बिना बात के मुँह गुब्बारे जैसे फुला लेती थी, और जरा सी ठुनकी पर खुद ही मान जाती, खेल में बेमानी के नाम पर रूठकर दूसरे  कोने में  बैठ जाती थी, अपनी बात मानते देख फिर से खिलखिला दिया करती थी, कच्ची अमिया, रसीली इमली के साथ बर्फ़ के गोले के वो ठेले, सब कुछ कितना छोड़ आई हूँ मैं वहां उस मोड़ पर, समझदारो की संगत लेकर वो ही नासमझी की दुनिया मुझे दे दो, थी प्यारी मेरी दुनिया, क्या खूब थे मेरे वो संगी साथी, बारिश में सड़कों में जमा पानी को पावों से उछालना, डांट पड़ने पर आँखों से सावन भादो बरसना, कितना कुछ था उस प्यारे बचपन में, जब से बड़ी हुई हूँ, असल में जीना छूट गया है, इस बड़प्पन में सब कुछ नापा तुला सा हो गया है, बेहिसाब सा जीने का वो अंदाज़ मुझे लौटा दो, यु झूठी मुस्कराहट जुटी तारीफे नहीं ज़रिरत हैं इनकी मुझे, मेरी सच्चाई अच्छे ही मुझे लौटा दो,

जि़न्दगी

या मौला कुछ ऐसी जि़न्दगी दे मुझे, चुटकी भर नमक...कुछ बूँदें शहद की, कुछ लम्हें मोहब्बत के...चंद लम्हात शिकायतों के, चंद ताने बेगानों के...ज़रा सी झिड़की अपनों की,

शब्‍दों का फर्क और जहन की बात.. कशमकश

जहन ए इवारत है ये या इवारत ए जहन फर्क शब्‍दों के हेर फेर का या जहन का कथन.... 

इबारत-ए-ज़हन

ज़हन का पन्ना मेरा भी  कुछ इबारत मेरे ज़हन की, कुछ लफ्ज़ मेरे ज़ेहन के, कुछ मेरे जज्बात, कुछ मन के सवाल, कुछ उन सवालों के जवाब, कुछ बाते मेरे ज़ेहन से…