वापसी
आज वापसी हुई थी, एक उजास की, संकल्प की और शक्ति की। घनघोर अंधेरे के बाद दमकते सबेरे का प्रकाश फैला था चारों ओर। एक नए सफर की, एक अदम्य चाह की वापसी हुई थी।
अलार्म बजा और शालिनी ने उसे धीरे से चुप कर दिया। सुबह, जाने कैसी सुबह...? खैर, सूरज निकल ही आया है। और शायद इसे ही सुबह कहा जाता है। सो, शालिनी की भी सुबह हो ही गई है या सिर्फ उजाला हुआ है, सुबह तो शायद बाकी है। खैर, अलार्म बंद करके शालिनी ने जल्दी से किचन को सम्भालना शुरू किया। बाकीदिनों के मुकाबले आज कुछ ज्यादा ही फुर्ति दिखाने की कोशिश कर रही थी। बहुत अहम काम जो उसे आज निबटाना है। निबटाना, कैसा अजीब-सा शब्द है। क्या-क्या और कैसे-कैसे निबटाना पड़ता है। कुछ सम्भालने और बचाने के लिए, कुछ फेंकना पड़ता है। वह भी कुछ ऐसा ही करने जा रही थी।
माता-जी ने पूजा-पाठ करके डायनिंग टेबिल पर आसन जमा लिया है। वहीं पास में पिताजी भी हिन्दी का अखबार लिए बैठे हैं। 'अरे! शालू जल्दी से चाय नाश्ता लगा दो। वरना तुम्हारे ससुर जी आज मुंह दिखाई नहीं करेंगे। माता जी कुछ भौंहे चढ़ाते हुए बोलीं।
'बाकी नाश्ता रख दिया है मम्मी जी, सिर्फ दूध और गर्म कर रही थी। पिता जी को जलेबी के बाद दूध पीना पसंद है न।' शालू दूध की कैटल लिए चली आ रही थी।
अपने लैपटॉप और बैग को सम्भालकर कुर्सी पर बैठते हुए आदेश बोला, 'गुडमॉर्निग पापा-मम्मा। आज क्या खास खबर है?
पेपर हटाते हुए,'क्या बताऊं, वही रोज़ के रेप, झेडख़ानी और राजनेताओं के बोल-वचन। वैसे, तुम अपना अंग्रेज़ी पढ़ो कुछ अलग मिले शायद।'
'अच्छा हुआ, जो तू आ गया। वरना आज तो लगा था, जैसे यह चांद अखबार की बदली से बाहर ही नहीं आएगा। नाश्ता शालू ने रख दिया और दूध भी ले आई, फिर भी मुंह छुपाए बैठे थे।' माता जी ने स्वभाव अनुरूप तंज कसा।
'अरे हां, आज तो अपॉइंटमेंट है न तुम्हारा। जल्दी से तैयार हो जाओ छोड़ आऊं? और आज की छुट्टी तो ली है न?' आदेश जलेबी उठाते हुए बोला।
शालिनी उसे एकटक देखते हुए बोली, 'हां, बस तैयार होने जा रही हूं। छुट्टी ले ली है।'
'हां, जाने क्या लिखा है किस्मत में। इतनी परेशानी इस बेचारी को झेलनी पड़ रही है। मिलकर भी कुछ हासिल नहीं होता।' माता जी अपनी चिंता जाहिर कर रहीं थी।
'आप सब को कुछ और ले आऊं?' डायनिंग टेबिल के एक कोने पर खड़ी शालिनी बोली।
'नहीं, तैयार होकर, तू निकल बेटा। अपॉइंटमेंट है तेरा। बाकी मैं देख लूंगी। और हां सुन, अकेले मत आना। १२ बजे के पहले फ्री हो जाना, तो हमें कॉल कर देना। अगर फ्री न हो पाए, तो आदेश आ ही जाएगा।' माता जी की चिंताओं ने फिर कुलांचे मारे।
आदेश और शालिनी निकल पड़े। रास्ते में चुप बैठी शालिनी की ओर एक बार आदेश ने देखा, तो पाया कि उसकी आंखे हर थोड़ी देर में गीली हो रही थीं। बिना कुछ बोले, दुपट्टे के कोने आंखों के किनारों को सूखा लेती थी। 'इज एवरीथिंग ऑल राइट शालू?' 'याह' आदेश को देखे बिना शालिनी ने कहा।
'आइ नो इट्स डिफिकल्ट फॉर यू। बट वी कान्ट डू एनिथिंग?' एक और चिंता शालिनी को सुनाई दी। फिर भी आदेश की ओर देखने की हिम्मत नहीं हुई उसकी। जाने क्यों? आज उसे सबसे नफरत-सी हो रही थी। किसी की चिंता, उसके प्रति फिक्र उसे अच्छी नहीं लग रही थी। अचानक ही ब्रेक लगा। 'अंदर चलता तुम्हारे साथ, पर बहुत ज़रूरी मीटिंग है। आई होप, यू अंडरस्टेंड।' कार का दरवाज़ा खोलते हुए आदेश बोल रहा था। सुबह से पहली बार शालिनी ने आदेश को देखा था। कैसा, शख़्त चेहरा दिख रहा था। एक अलग-सा उबाल आया शालिनी के ज़हन में। आदेश के हाथ से फाइल लेकर, वो चल पड़ी।
भारी कदम हो रहे थे, बहुत भारी। कुछ ऐसा था, जो वहां जाने नहीं देना चाहता था, पर जाना तो था ही। किसी मशीन की तरह ही शालिनी अपने शरीर को धकेल रही थी। काउंटर पर गई, अपने रिपोर्ट और आपॉइंटमेंट बताया। कुछ देर बाद काउंटर पर टोकन मिला। और वह जाकर कुर्सी पर बैठ गई।
'पिछले कुछ महीने से कितनी खुश थी। या यूं कहा जाए कि जब तक रिपोर्ट नहीं आई थी तब तक। रिपोर्ट आते ही कोई वरदान कैसे श्राप में तब्दील हो जाता है। वह भी अंश होता और यह भी...। जिसके लिए इतने सपने बुने, खुशिया मनाई गईं। वह आज अचानक ही बेवजह हो गई, वह खुशियों की वजह बोझ बन गई। सड़ा हिस्सा, जिसे कैंसर बनने से पहले उखाड़ देना है। क्या दर्द नहीं होगा, मेरा सपना फिर से बिना मुझसे पूछे ही तोड़ देने का हुक्म दे दिया गया है। मेरे मां बनने की खुशी में अंजना ने सारे ऑफिस में मिठाईंया बांटी थी। वजह भी तो थी, पहली बार वाला मिस कैरेज हो गया था। मिस कैरेज हुआ था या करवाया था!' यह सब उसके अवचेतन मन में चल ही रहा था कि एक तेज़ आवाज़ से उसकी तंद्रा भंग हुई।
'मैं नहीं करेगी? तू चला जा। दो और घर पकड़ लूंगी। चार घर का तो करती ही हूं। पर इस जीव को नहीं मारती मैं। इस जान की क्या गलती है, जो इसे मौत की सजा दूं। अपने चारों बच्चों को मैं पाल लूंगी।' चिल्लाते और एक आदमी को धकाते हुए महिला बाहर आ गई। उसके पहनावे से वो घर में काम करने वाली जैसी ही थी।
पर आज उसकी और शालिनी की स्थिति एक जैसे ही तो थी।
वह औरत जिसे दो वक्त के खाने के लिए चार घरों में बर्तन मांजना पड़ता है, वह अपने बच्चे के लिए विद्रोह कर सकती है। तो शालिनी, जो बैंक में अच्छे-खासे पद पर काम करती है। वह अपनी इस नन्ही-सी जान को बचा नहीं सकती। वह क्या इतना भी नहीं कर सकती, अपने उस हिस्से के लिए, जिसने इस दुनिया को देखा ही नहीं।
'नहीं, मैं इसे दुनिया दिखाऊंगी। कोई और साथ दे न दे। मैं हूं तेरे साथ मेरी बच्ची। मां हूं मैं, तेरी मां। मां, जननी है। धार्या है। सृजक है। सृजक विनाशक नहीं है।' शालिनी ने उस अजन्मे को दुनिया दिखाने का, उसे जीवित संसार दिखाने का प्रण किया और उठकर बाहर जाने लगी। 'अरे मैडम, बस आपकी बारी आने वाली है।'
'नहीं, बारी आ गई। ले लिया निर्णय।' हल्की सी मुस्कान थी और एक चमक थी। अपने अस्तित्व को, अपने अंश को बचाने की खुशी थी शायद।
बाहर निकली तो देखा, तेज़ कदमों से आदेश चला आ रहा था। 'ओह नो! तुमने...'
'हां मैंने।' शालिनी ने उसकी आंखों में आंखें डालते हुए कहा।
'ओह, शालू, मुझे माफ कर दो। मैंने देर कर दी शायद।' शालिनी को अपने सीने से लगाते हुए आदेश बोला।
'आदेश कुछ कहना है, पहले मेरी बात सुनो।' आदेश को धकेलते हुए बोली।
'दरअसल, मैं जिसके लिए आई थी, वो पूरा नहीं किया। मैं अपना और अपनी बच्ची का ख्य़ाल रख सकती हूं। आगे जो भी फैसला करना हो मुझे बता देना।' आदेश की आंखों में देखते हुए अपना शालिनी ने फैसला सुनाया।
'ओह थैक्यू, थैंक्यू। तुमने मेरी लिटिल एंजि़ल को बचा लिया। हम मिलकर बात करेंगे मम्मी से और इसमें पापा भी हैं हमारे साथ।' शालिनी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला।
'सच्ची, ओह आदेश, तुमने मुझे वो खुशी दी है, जिसे मैं बयां नहीं कर सकती।'
'घर चलें।' कार का दरवाज़ा खोलते हुए आदेश ने कहा।
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