अलहदा रिश्ता

रिश्तों में दोस्ती को सबसे खास माना जाता है, क्योंकि यही तो वह रिश्ता जिसे हम बनाते हैं। अपनी पसंद से और मजबूरी से। 

आज काफी दिनों के बाद शर्मा जी के चेहरे पर मुस्कान देखी। अच्छा लगा। कितनी मासूम मुस्कान है उनके चेहरे पर। बीते दो सालों से जैसे वह मुस्कान कहीं गुम ही हो गई थी। मुस्कान खोने की वजह भी तो थी। दो वर्ष पूर्व ही तो सुचेता जी उन्हें अकेले छोड़कर चली गई थीं। सुचेता शर्मा, संजय शर्मा की धर्मपत्नी थीं।

 शासकीय कॉलेज में लेक्चरर थे और सुचेता जी उनकी गृहस्वामिनी। मिस्टर और मिसेज शर्मा के दो बच्चे थे, मल्लिका और संस्कार। मल्लिका बड़ी थी, सो उसकी शादी तीन वर्ष पूर्व ही मरीन इंजीनियर से कर दी गई थी। बड़ी धूम-धाम से शादी हुई थी। शादी के हर फंग्शन में शर्मा जी, सुचेता जी को ज़ोहरा ज़बी बुलाते थे, उसे देखकर तो नया-नवेला जोड़ा भी शरमा जाए। शर्मा जी के छेड़ पर, सुचेता जी की हया से उनके चेहरे पर बिखर जाने वाली गुलाबी रंगत किसी नवयुवती को भी शर्मसार कर जाए। रिवाज़ पूरे हुए, बेटी विदा हो गई।
जि़ंदगी चलती रही, पर सुचेता जी और शर्मा जी के रिश्ते की गर्माहट इस उम्र में भी पहले की ही मानिंद बनी रही। तभी एक दिन संस्कार ने अपनी मां के गले में हाथ डालते हुए कहा, 'मां, मेरे प्रमोशन की खुशी में दोस्तों को पार्टी चाहिए थी, तो मैं उन्हें घर पर शाम को इन्वाइट किया है। आप बोलो तो मना कर दूं
सुचेता जी हाथ को पीछे घुमाते हुए उसके सिर पर ले जाकर बालों को सहलाते हुए बोलीं, 'अरे पगले, तेरी मां इतना भी नहीं कर सकती। वैसे भी मल्लिका के जाने के बाद कोई पार्टी हुई ही कहां है।खुश होते हुए मां के गालों पर एक बड़ा सा बोसा दिया था उस दिन संस्कार ने। एक अरसे के बाद संस्कार ने मां को बोसे का उपहार दिया था। बोसा मतलब एक प्‍यारी-सी चुम्‍मी। 'मां, मैं जल्दी आ जाऊंगा, काम में हाथ बंटाने के लिए, जाते-जाते वह बोल गया।
'पगला है, सुन रहे हैं इसकी बात शर्मा जी की ओर देखते हुए कहा सुचेता जी ने। 'पगला कहां है? आप अकेली हो गईं है, तो मदद करने को कहा है उसने। मैं भी जल्दी आने की कोशिश करूंगा। कहते हुए गाड़ी की चाबी लेकर शर्मा जी भी कॉलेज चले गए।
शाम को शर्मा जी के घर से आने वाले पकवान की खुशबू पूरे मोहल्ले में महक रही थी। शाम का धुंधलका हो रहा था, तभी एक कार और दो बाइक रूकीं। उनमें से कुछ युवक और युवतियां निकल कर घर में प्रवेश कर रही थीं। पहनावे से काफी मॉडर्न नज़र आ रहे थे सभी। शर्मा जी भी कहां कम थे, वे तो सबके सामने ही सुचेता जी को ज़ोहरा ज़बी बुलाने लगे। संस्कार भी प्रफुल्लित हो रहा था। संस्कार ने दोस्तों का परिचय करवाया, 'ये है विनय और राहुल, मयंक और निशी, धीरज और शालिनी। दरअसल, पापा मयंक और निशी व धीरज और शालिनी लिव इन रिलेशनशिप में हैं। 'अच्छा-अच्छा, बहुत अच्छा लगा आप सब बच्चों को देखकर, कहते हुए चाय उठाई।
थोड़ी देर की बतकही के बाद सबने खाना-वाना खाया और विदा लेकर सब चले गए। हां, पर जाते-जाते सुचेता आंटी के फैन बन गए थे। शर्मा जी भी काफी प्रसन्न हुए। समय चलायमान है। कुछ दिनों बाद संस्कार की भी शादी हो गई। सुंदर-सुशील बहु पाकर सुचेता जी भी फूले न समाई। सबसे तारीफ किया करती थीं। घर को तो संस्कार की बहु ने अच्छे से सम्भाल लिया है। सुबह के समय मिस्टर एंड मिसेज़ शर्मा वॉक पर निकल पड़ते थे। वॉक से लौटते ही, गर्मा-गर्म चाय के साथ बहुरानी मिलती थीं।
समय, कब और कहां एक सा रहा है। बुढ़ापे का भी दोष क्या कहा जाए? सुचेता जी इन दिनों कुछ बीमार रहने लगी थीं। कई सारे टेस्ट करवाए गए। टेस्ट के नतीज़े बता रहे थे कि सुचेता जी का दिल कमज़ोर हो गया है। मज़ाक में शर्मा जी सुचेता जी को छेड़ा करते थे, 'कमज़ोर तो होगा ही, कहता हूं, भई इश्क है तो इज़हार करो। क्यों इतना बोझ लिए फिरती हो। 'धत्, कुछ शरम किया करो आप, बहु वाले हो गए हो।अपने माथे पर हथेली को मारते हुए कहा। दिन बीतते गए, एक रात या यूं कहा जाए एक भोर शर्मा जी के घर से आवाज़ें आने लगीं। कुछ देर टालने के बाद, क्या जानने की नियत से उनके घर का दरवाज़ खटखटाया, तो पाया कि सुचेता जी को दिल को दौरा पड़ा है और उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा है। उनके पीछे हम भी हॉस्पिटल पहुंचे।
एक बेड पर सुचेता जी आंख बंद किए पड़ी थीं, और उनके माथे पर हाथ फेरते हुए शर्मा जी बिना कुछ बोले एकटक देखे जा रहे थे। बगल में खड़ी बहु के आंसू थम नहीं रहे थे। संस्कार मां को बुला रहा था। पर मां वहां थी कहां, वो तो अनंत सफर पर चल पड़ी थी।
अंतिम संस्कार की विधि तक बेटी-दामाद भी आ गए थे। यूं अचानक अपनी दुनिया खत्म हो जाने का गम शर्मा जी के चेहरे पर दिखने लगा था।  वॉक पर अकेले जाने का मन नहीं करता था, पर अब उनका अपना कमरा उन्हें काटने को दौड़ता था। हर जगह सुचेता जी दिखाई देती थीं। वॉक पर वे रोज़ जाते। आने के बाद चाय-नाश्ता और कॉलेज का स$फर जारी रहा। बहु-बेटे उनका ख्य़ाल रखते थे। पर एक वो स्थान, जो सुचेता जी का था, संवाद का था, हंसी-ठिठोली का था, इतना पुराना और घनिष्ठ नाता का स्थान, अब 'रिक्त हो गया था।
वह दिन भी आ गया, जिसने एक और पुराना नाता तोड़ दिया। कॉलेज से रिटायर हो गए थे शर्मा जी। वॉक से आने के बाद पूरा समय घर पर बीतता था। $खुद को बिज़ी रखने के लिए उन्होंने शाम को भी सैर पर जाने का रूटीन फिक्स कर लिया था, आते हुए सब्ज़ी भी ले आया करते थे।
ऐसे ही एक दिन अधेड़ उम्र की एक महिला कुछ हांफती-सी आगे चली जा रही थी, उसके हाथ में सब्जि़यों का एक थैला था। अपने फर्लांग तेज़ करते हुए, उसके पास गए और बोले, 'मैं मदद कर दूं आपकी।उस महिला ने उन्हें आश्चर्य से देखा, 'अरे आप!
दरसअल, उस महिला का नाम था प्रतिमा। प्रतिमा और सुचेता अच्छी सहेलिया हुआ करती थीं। पर अरसे से कए-दूसरे का कुछ पता नहीं, या यूं कहा जाए कि जब से इस कॉलोनी में आए तब से।
दोनों बुजुर्ग सड़क पर लगी बेंच पर बैठ गए। प्रतिमा, ने अपनी आप बीती बताई। कैसे अचानक उनके पति का देहांत हुआ और कैसे किस्मत ने पलटी मारी, नौकर-चाकर वाले घर की मालकिन की बहु ने उसे नौकरानी बना दिया।  बात तो यह थी कि प्रतिमा भी उसी मोहल्ले में रहने आ गई थी। बस चार महीने पहले ही, उनके बेटे ने यहां मकान खरीदा था।
दोनों एक-दूसरे को जानते थे और दोनों के बीच कॉमन थी 'ज़ोहरा ज़बी। अब तो जैसे हर रोज़ का ही था, सुबह और शाम की सैर साथ करना। सुचेता की दोस्त शर्मा जी की भी दोस्त बन गई। एक मर्द और एक औरत की 'दोस्ती कब समाज का रास आई थी, जो अब आती। बस बाते बननी शुरू हुईं, और बात संस्कार के कानों तक आ पहुंचीं।
आज संस्कार बिल्कुल अच्छे मूड में नहीं था। खाने की टेबिल पर बैठा पापा का इंतज़ार कर रहा था। उन्हें देखते ही बोल पड़ा, 'ये क्या है पापा?...यह सब आपको शोभा नहीं देता। सभ्य समाज में रहते हैं हम सब।संस्कार से इस तल्ख लहजे की कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी, शर्मा जी ने। अपनी कुर्सी पर, यानी मुखिया की कुर्सी पर बैठते हुए वे ठिठक गए, 'मतलब! 'मतलब यह पापा कि आपकी उम्र है भगवान-भजन में मन रमाने का, न की कृष्ण कन्हैया बनकर गोपियों के संग घूमने का। शर्मा जी कुछ कहते उससे पहले ही, संस्कार की पत्नी ने कहा, 'अजी, कुछ सोचकर बोलिए। 'तुम चुप ही रहो, जो काम है उतना ही करो।
'तू साफ-साफ बोल।गुस्से से तमतमाते हुए शर्मा जी का चेहरा भक लाल हो गया। 'आप निशांत की मम्मी के साथ सुबह-शाम कुछ ज़्यादा ही वॉक करने लगे हैं। लहज़ा तल्ख था। अब तो शर्मा जी हत्थे से उखड़ गए और बोले, 'अच्छा, समाज! जब अपने लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले दोस्तों को डिनर पर लाए थे, तब कहां थे समाज के ठेकेदार?...जिस गोपी के साथ ये कन्हैया वॉक वाली रासलीला कर रहा है। वह तुम्हारी प्रतिमा मौसी हैं, जिनके हाथ से पहली बार तुमने खाना खाया था। वह तुम्हारा निशांत, जिसने उस औरत का जीना दुर्भर कर दिया है, समाज का पैरोकार बना फिर रहा है। अब तो बहु एक ओर खड़ी थी और संस्कार को तो जैसे सांप सूंघ गया। उसने पापा का ऐसा रूप पहले देखा जो नहीं  था। कुर्सी छोड़ वे उठ गए, 'किसने कहा एक औरत और मर्द के बीच सिर्फ़ इश् क ही हो सकता है। क्या वे दोस्त नहीं रह सकते। और दोस्त भी क्‍या सिर्फ जवानी में ही बनाए जा सकते हैं,इस उम्र में क्‍या दोस्‍ती नहीं की जा सकती। हम बूढ़े अपनी  दोस्ती नहीं कर सकते?
 ...यह तो यक्ष प्रश्न था। सब चुप खड़े रहे।

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