लाल डायरी के नीले हर्फ़ !
कुशल नटनी-सी अपने काम में जुटी हुई शुभ्रा का दिन सबसे पहले आता है और रात सबसे आख़िर में उसे नसीब होती है। कहने को वो सिर्फ़ ‘गृहणी’ है। यह शब्द भी क्या ख़ूब है?...
'जिम्मेदारी' महज एक लफ़्ज़ है या उससे कुछ ज़्यादा। इसका अंदाज़ा तो जिम्मेदारियों को ढ़ोने वाला ही बता सकता है। सभी के हिस्से यह शब्द 'जिम्मेदारी' आता ही है। कोई जिम्मेदारी निभाता भर है और किसी की ज़िंदगी जिम्मेदारियों में ही गुजर जाती हैं। उन्हीं लोगों में आती है शुभ्रा। शुभ्रा, एक गृहणी है।
घर संभालने से लेकर रिश्तों को सहेजना, सब कुछ उसके जिम्मे आता है। इस जिम्मेदारी को बिना किसी शिक़ायत के बीते बीस सालों से निभा रही है। हां, कभी-कभी माता जी का झुर्रियों भरा हाथ शुभ्रा के सिर पर जाता है और दुलारते हुए कहती हैं, “तू तो मेरी लक्ष्मी है। मेरे परिवार की बगिया को तूने महका रखा है। एकदम कुशल गृहणी है री तू तो”। माता जी के इस आशीष में पिता जी भी सहभागी बन जाते थे। झट से अपना बखान करते हुए कहते, “आख़िर पसंद किसकी थी। मैंने ही तो शुक्ला जी से शुभ्रा का हाथ मांगा था, गुड्डू के लिए”। तारीफ़ की इतनी-सी ही ख़ुराक़ शुभ्रा के लिए कई दिनों तक तरोताज़ा बने रहने के लिए काफ़ी होती थी।
गुड्डू यानी मयंक। मयंक, शुभ्रा के पति हैं, जिन्हें घर में गुड्डू बुलाया जाता है। इन दोनों की शादी, दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने के तर्ज़ पर हुई थी।
शुभ्रा ग्रेजुएशन फाइनल ईयर की छात्रा थी और मयंक एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। दोनों के परिवार में रिश्ते की बात आम थी। अचानक शुभ्रा के पिता जी रमाकांत शुक्ला और मयंक के पिता जी राधेकृष्ण पाठक की बात चल निकली। चाय की टपरी पर चाय की चुस्की लेते-लेते रिश्ते के धागे जोड़ दिए। दोनों शादी की सीढ़ी के पहले पायदान पर चढ़ने को तैयार हो गए। मसलन, पंडित जी मय पोथी-पत्रा लेकर घर आ धमके।
“वाह! ऐसा लगता है कि दोनों एक-दूसरे के लिए ही बनें हों। इतनी अच्छी कुंडली तो हमने आज तक नहीं देखी”। पंडित जी ने एक बर्फ़ी का टुकड़ा दबाते हुए कहा।
पिता जी की ओर से रिश्ता तो तय था, लेकिन माता जी बिना लड़की देखे, कैसे बहुरिया बनाएंगी। माता जी भी पल्ला ठीक करते बैठक में आ गई और लड़की की फोटो की मांग रख दी। शुभ्रा के पिता जी तो जैसे पूरी तैयारी के साथ शादी की जंग में मैदान मारने आए थे। मांग आते ही, झट से लड़की की तस्वीर आगे कर दी।
“वाह! दिखने में तो अच्छी लग रही है। अब स्वभाव का कैसे पता चलेगा। कुछ पढ़ी-वढ़ी है भी कि नहीं, पता चले हमारे गुड्डू के गले में ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ बंध जाए”। शुभ्रा के पिता जी के जाते ही माता जी ने पिता जी पर सवालिया फायरिंग शुरू कर दी थी। आज भी शुभ्रा से पिता जी उस वाकये के बारे में हंसते हुए बताते हैं, माता जी भी थोड़ा- सा पल्ला दांतों में दबा कर हंस देती हैं।
मयंक की माता जी के सभी शक-ओ-शुबहा दूर होने के बाद बारी थी मयंक और शुभ्रा की मुलाक़ात की। सो दोनों की मुलाक़ात के लिए कैफ़े का चुना गया।
मयंक कुछ संकोची स्वभाव का था और और शुभ्रा खुली हुई। मयंक के गोरे गाल कुछ लाल हो गए थे। यूं तो दोस्तों के संग खूब मस्ती की। दोस्तों की टोली में लड़कियां भी थी, लेकिन शुभ्रा को देखते ही, जाने क्यों मयंक शरमा रहा था। वहीं शुभ्रा बेझिझक टेबिल पर रखे मैनू को देख रही थी। “क्या ऑर्डर करूं?” शुभ्रा के सवाल से हकबका गया था मयंक। ख़ुद संभालते हुए बोला, “जो आपका मन करे”।
शुभ्रा भी मुस्कुराते हुए बोली, “अरे हुजूर, शरमाइए नहीं, बिल आपको की चुकाना है”। इसके बाद तो दोनों की हंसी फूट पड़ी थी। शादी का ये तीसरा और अंतिम चरण था, जो सफलता पूर्वक पूरा हो गया।
सगाई के छह महीने बाद दोनों की शादी हो गई। विदाई के बाद शुभ्रा की पूरी ज़िदगी ही जैसे बदल गई। कहां वो मस्तमौला लड़की, बेपरवाह सी हुआ करती थी। अब वो जिम्मेदार बहू बन गई है। बहू, बीवी और मां... तीनों पड़ावों को बखूबी निभा रही है और वो खुश भी बहुत है।
“शुभ्रा,शुभ्रा...” माता जी लगातार बुलाए जा रही थीं।
“क्या हुआ मां?” शुभ्रा भागते हुए आई।
“अरी, बावरी, मुझे कुछ नहीं हुआ। सुन ना, आज वो लाल तांत वाली साड़ी पहन कर दिखा तो...” माता जी की इस बालसुलभ मांग को शुभ्रा समझ नहीं पा रही थी। सन्न खड़ी माता जी को देख रही थी।
शुभ्रा का हाथ थामकर बैठाते हुए माता जी बोलीं, “ख़ुद को भी आईने में देख लिया कर। सबका ख़याल रखते-रखते ख़ुद को भूलना अच्छी बात नहीं है। जा आज अच्छी तरह तैयार होकर आ” ।
“ठीक है, मां, जाती हूं.” हंसती हुई शुभ्रा चली गई।
“लाला तांत वाली साड़ी! वाकई, कई साल गुज़र गए। आज निकालती हूं, कल पहनूंगी”। सोच कर शुभ्रा ने अपनी साड़ियों के खजाने में हाथ डाला। साड़ियों के बीच से अचानक कुछ सख़्त सा महसूस हुआ। अपनी खोज को बीच में छोड़ शुभ्रा ने उस सख़्त चीज को निकाल लिया। वो शुभ्रा की लाल डायरी थी। अलमारी को बंद कर वो डायरी लेकर शुभ्रा अपनी आराम कुर्सी पर बैठ गई।
लाल डायरी में उसने अपने कुछ बेहद हसीन लम्हों को हर्फ़ों में क़ैद करके रखा था। शुभ्रा ने जैसे ही डायरी के पन्ने पलटे, वैसे वो बीते वक़्त में पहुंच गई। डायरी नहीं जैसे कोई ‘टाइम मशीन’ हो। उन नीले हर्फ़ों में कै़द वक़्त छूते ही आज़ाद हो गए।
उन नीले हर्फ़ों पर सवार होकर शुभ्रा बीते सालों की सैर पर निकल गई। सैर में कॉलेज वाली शुभ्रा से मिली। बेबाक, खुशमिज़ाज, बेफ़िक्र-सी वो लड़की। डायरी के पन्ने से निकलकर शुभ्रा के पास आ गई।
अगला पन्ना पलटते ही नई-नवेली ब्याहता शुभ्रा चटक रंगों की साड़ी और जेवर से लदी-फदी उसके करीब आकर बैठ गई। जैसे तीन सहेलियां काफ़ी अरसे बाद मिली हों, तीनों एक-दूजे को देख रहीं थीं। मुस्कुरा रही थीं, तभी अचानक आवाज़ आई और शुभ्रा की तंद्रा टूटी। लाल डायरी और नीले हर्फ़ों के साथ अकेली शुभ्रा बैठी थी।
पांच बज गए थे, और उसका ऑफ़िस ऑवर छोटे से ब्रेक के बाद फिर शुरू हो गया था, लेकिन अपनी ‘टाइम मशीन’ यानी लाल डायरी को संभाल कर उसने फिर से अलमारी में रख दिया। ताज़ा दम होने के लिए कभी-कभी बीते खु़शनुमा पलों की सैर करने में बुराई ही क्या है...?
घर संभालने से लेकर रिश्तों को सहेजना, सब कुछ उसके जिम्मे आता है। इस जिम्मेदारी को बिना किसी शिक़ायत के बीते बीस सालों से निभा रही है। हां, कभी-कभी माता जी का झुर्रियों भरा हाथ शुभ्रा के सिर पर जाता है और दुलारते हुए कहती हैं, “तू तो मेरी लक्ष्मी है। मेरे परिवार की बगिया को तूने महका रखा है। एकदम कुशल गृहणी है री तू तो”। माता जी के इस आशीष में पिता जी भी सहभागी बन जाते थे। झट से अपना बखान करते हुए कहते, “आख़िर पसंद किसकी थी। मैंने ही तो शुक्ला जी से शुभ्रा का हाथ मांगा था, गुड्डू के लिए”। तारीफ़ की इतनी-सी ही ख़ुराक़ शुभ्रा के लिए कई दिनों तक तरोताज़ा बने रहने के लिए काफ़ी होती थी।
गुड्डू यानी मयंक। मयंक, शुभ्रा के पति हैं, जिन्हें घर में गुड्डू बुलाया जाता है। इन दोनों की शादी, दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने के तर्ज़ पर हुई थी।
शुभ्रा ग्रेजुएशन फाइनल ईयर की छात्रा थी और मयंक एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। दोनों के परिवार में रिश्ते की बात आम थी। अचानक शुभ्रा के पिता जी रमाकांत शुक्ला और मयंक के पिता जी राधेकृष्ण पाठक की बात चल निकली। चाय की टपरी पर चाय की चुस्की लेते-लेते रिश्ते के धागे जोड़ दिए। दोनों शादी की सीढ़ी के पहले पायदान पर चढ़ने को तैयार हो गए। मसलन, पंडित जी मय पोथी-पत्रा लेकर घर आ धमके।
“वाह! ऐसा लगता है कि दोनों एक-दूसरे के लिए ही बनें हों। इतनी अच्छी कुंडली तो हमने आज तक नहीं देखी”। पंडित जी ने एक बर्फ़ी का टुकड़ा दबाते हुए कहा।
पिता जी की ओर से रिश्ता तो तय था, लेकिन माता जी बिना लड़की देखे, कैसे बहुरिया बनाएंगी। माता जी भी पल्ला ठीक करते बैठक में आ गई और लड़की की फोटो की मांग रख दी। शुभ्रा के पिता जी तो जैसे पूरी तैयारी के साथ शादी की जंग में मैदान मारने आए थे। मांग आते ही, झट से लड़की की तस्वीर आगे कर दी।
“वाह! दिखने में तो अच्छी लग रही है। अब स्वभाव का कैसे पता चलेगा। कुछ पढ़ी-वढ़ी है भी कि नहीं, पता चले हमारे गुड्डू के गले में ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ बंध जाए”। शुभ्रा के पिता जी के जाते ही माता जी ने पिता जी पर सवालिया फायरिंग शुरू कर दी थी। आज भी शुभ्रा से पिता जी उस वाकये के बारे में हंसते हुए बताते हैं, माता जी भी थोड़ा- सा पल्ला दांतों में दबा कर हंस देती हैं।
मयंक की माता जी के सभी शक-ओ-शुबहा दूर होने के बाद बारी थी मयंक और शुभ्रा की मुलाक़ात की। सो दोनों की मुलाक़ात के लिए कैफ़े का चुना गया।
मयंक कुछ संकोची स्वभाव का था और और शुभ्रा खुली हुई। मयंक के गोरे गाल कुछ लाल हो गए थे। यूं तो दोस्तों के संग खूब मस्ती की। दोस्तों की टोली में लड़कियां भी थी, लेकिन शुभ्रा को देखते ही, जाने क्यों मयंक शरमा रहा था। वहीं शुभ्रा बेझिझक टेबिल पर रखे मैनू को देख रही थी। “क्या ऑर्डर करूं?” शुभ्रा के सवाल से हकबका गया था मयंक। ख़ुद संभालते हुए बोला, “जो आपका मन करे”।
शुभ्रा भी मुस्कुराते हुए बोली, “अरे हुजूर, शरमाइए नहीं, बिल आपको की चुकाना है”। इसके बाद तो दोनों की हंसी फूट पड़ी थी। शादी का ये तीसरा और अंतिम चरण था, जो सफलता पूर्वक पूरा हो गया।
सगाई के छह महीने बाद दोनों की शादी हो गई। विदाई के बाद शुभ्रा की पूरी ज़िदगी ही जैसे बदल गई। कहां वो मस्तमौला लड़की, बेपरवाह सी हुआ करती थी। अब वो जिम्मेदार बहू बन गई है। बहू, बीवी और मां... तीनों पड़ावों को बखूबी निभा रही है और वो खुश भी बहुत है।
“शुभ्रा,शुभ्रा...” माता जी लगातार बुलाए जा रही थीं।
“क्या हुआ मां?” शुभ्रा भागते हुए आई।
“अरी, बावरी, मुझे कुछ नहीं हुआ। सुन ना, आज वो लाल तांत वाली साड़ी पहन कर दिखा तो...” माता जी की इस बालसुलभ मांग को शुभ्रा समझ नहीं पा रही थी। सन्न खड़ी माता जी को देख रही थी।
शुभ्रा का हाथ थामकर बैठाते हुए माता जी बोलीं, “ख़ुद को भी आईने में देख लिया कर। सबका ख़याल रखते-रखते ख़ुद को भूलना अच्छी बात नहीं है। जा आज अच्छी तरह तैयार होकर आ” ।
“ठीक है, मां, जाती हूं.” हंसती हुई शुभ्रा चली गई।
“लाला तांत वाली साड़ी! वाकई, कई साल गुज़र गए। आज निकालती हूं, कल पहनूंगी”। सोच कर शुभ्रा ने अपनी साड़ियों के खजाने में हाथ डाला। साड़ियों के बीच से अचानक कुछ सख़्त सा महसूस हुआ। अपनी खोज को बीच में छोड़ शुभ्रा ने उस सख़्त चीज को निकाल लिया। वो शुभ्रा की लाल डायरी थी। अलमारी को बंद कर वो डायरी लेकर शुभ्रा अपनी आराम कुर्सी पर बैठ गई।
लाल डायरी में उसने अपने कुछ बेहद हसीन लम्हों को हर्फ़ों में क़ैद करके रखा था। शुभ्रा ने जैसे ही डायरी के पन्ने पलटे, वैसे वो बीते वक़्त में पहुंच गई। डायरी नहीं जैसे कोई ‘टाइम मशीन’ हो। उन नीले हर्फ़ों में कै़द वक़्त छूते ही आज़ाद हो गए।
उन नीले हर्फ़ों पर सवार होकर शुभ्रा बीते सालों की सैर पर निकल गई। सैर में कॉलेज वाली शुभ्रा से मिली। बेबाक, खुशमिज़ाज, बेफ़िक्र-सी वो लड़की। डायरी के पन्ने से निकलकर शुभ्रा के पास आ गई।
अगला पन्ना पलटते ही नई-नवेली ब्याहता शुभ्रा चटक रंगों की साड़ी और जेवर से लदी-फदी उसके करीब आकर बैठ गई। जैसे तीन सहेलियां काफ़ी अरसे बाद मिली हों, तीनों एक-दूजे को देख रहीं थीं। मुस्कुरा रही थीं, तभी अचानक आवाज़ आई और शुभ्रा की तंद्रा टूटी। लाल डायरी और नीले हर्फ़ों के साथ अकेली शुभ्रा बैठी थी।
पांच बज गए थे, और उसका ऑफ़िस ऑवर छोटे से ब्रेक के बाद फिर शुरू हो गया था, लेकिन अपनी ‘टाइम मशीन’ यानी लाल डायरी को संभाल कर उसने फिर से अलमारी में रख दिया। ताज़ा दम होने के लिए कभी-कभी बीते खु़शनुमा पलों की सैर करने में बुराई ही क्या है...?
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