ख़्वाब की ख़्वाहिश
इक ख़्वाब पलकों से सरक कर सिरहाने उतर गया,
कानों के पास आकर फुसफुसाते हुए कहता है कि थक गया हूं,
हर रोज़ तुम्हारी उम्मीद का दामन थामे, अब हांफने लगा हूं,
दम भर लेने तो, कुछ ताज़ा दम होने दो,
अब कुछ देर तुमसे दूर ही रहने दो,
तब तलक तुम कुछ नया बुनो,
देखो कुछ नया-नया सा,
यूं कब तक मुझको सजाए रखोगी,
पालो नई उम्मीदें, बुनों कुछ ख़्वाब नए नवेले,
मिलूंगा मैं भी ज़रूर तुमसे, बस थोड़ा सुस्ता लूं...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें