प्रेम के रूप...
किसी ने प्रेम को सम्मान कहा,
किसी के लिए समर्पण बन गया,
कुछ परिभाषित करते रहे,
कुछ इसमें आकंठ डूब गए,
किसी ने शाब्दिक रूप में अधूरा पाया,
कोई एक पल में पूरा जी गया,
कभी यह राह कठिन लगा,
कभी हर मझधार का पतवार बना,
किसी के लिए भ्रम, छलावा बना,
किसी के जीवन का अंतिम सुख, परम आनंद
बहुरूपिया प्रेम,
सबके लिए एक अलग रूप में आता है,
जो जैसा हो, वैसा प्रेम बन जाता है।
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#श्वेता #पंक्ति
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