वजूद

कहने को पूरा घर उसका है, लेकिन घर का कोई एक कोना अपने लिए सिर्फ अपने लिए नहीं रख पाती। यूं तो उसे कोई शिक़ायत नहीं, लेकिन अपने लिए स्पेस की कसमसाहट उसके भीतर है।

घर का वो हिस्सा, दिन का वो वक़्त जब सिर्फ अपने लिए उसने रख छोड़ा हो, नहीं है। खयालों में भी बेवजह लोगों की आवाजाही है।

शिक़ायत नहीं है, क्योंकि जो उसके पास है, उसे दुनिया में संपूर्णता का नाम दिया जाता है।

पूरा परिवार, आलीशान कोठी। कोठी की मालकिन, लेकिन बावजूद उसको अपना वजूद नहीं नज़र आता।

किसी की पत्नी, खानदान की बहू और बच्चों की मां। यही तो हैं उसकी कमाई। लेकिन सबमें बंट कर खुद के लिए वो बची ही नहीं।

इस कमाई पर उसे गुमान है। फिर भी उसको कुछ तो कम लगता है। घर का वो पिलर है, जिस पर सब टिके हैं, लेकिन क्या उसके होने का अहसास किसी को है?

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