पलायन

जानें वो बातों का कौन-सा सिरा खोलता था कि स्वेटर की तरह सारे फंदे उधड़ने लग जाते।
हमारी मुलाकातें दफ्तर से बाहर भी निकलने लगीं। संकोच की मुस्कुराहट, ठहाके में गुंजने लगे। महीने कब साल में बदले और दोस्ती खास होते हुए इश्क़ में तब्दील हो गई।
चित्र - इंटरनेट से साभार
चित्र - इंटरनेट से साभार

ख़ुद को आईने में पार्लर से आने के बाद जाने कितनी दफा निहार चुकी है। कभी लट को एक तरफ करती है, तो कभी टच अप करने लग जाती है। प्रजेंटेबल रहना उसकी आदत है, लेकिन आज की बात ही अलग है। उसके रूप श्रृंगार में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।

खुद को निहारने के अलावा निहारिका बार बार पूछे जा रही थी "वो आ गए"... प्रतिउत्तर में "ना" सुन होंठों को भीचकर कुछ देर बैठ जाती। फिर कहती कि ट्रैफिक भी तो है, बेचारे कहीं फंस गए होंगे।

घर में चहल पहल थी, हर तरफ सब व्यस्त ही नजर आ रहे थे और निहारिका गुजरे पलों में पहुंच गई। जब वो पहली बार दिबाकर से मिली थी।

पहली बार वो दफ्तर में नया आया था। शांत रहता था। कम बोलने वाला, कुछ संकोची सा लड़का। शुरू में देख कर लगा, हुंह क्या अजीब प्राणी है, न हाय न हैलो। मुर्गी के दड़बे सरीखे अपने क्यूबिक में बैठ जाता है। फिर धीरे धीरे ऑफिस के कैंटीन में कॉफी पर मिलने लगे या यूं कहा जाए कि इत्तेफाकन मुलाकाते होने लगीं। कॉफी पर बातें शुरू हुई तो उससे इंप्रेस होने लगी। कोई इतना क्रिएटिव और बौद्धिक लड़का इस छोटे से क्यूबिक वाली नौकरी क्यूं कर रहा है?....ये सवाल कई दफा उठा लेकिन कहीं बुरा न मान जाए और दोस्ती भी नई है, सो पूछा नहीं।

हां, अलबत्ता उसकी कंपनी अच्छी लगती थी, सो घंटों बाते करने लगी।
जानें वो बातों का कौन-सा सिरा खोलता था कि स्वेटर की तरह सारे फंदे उधड़ने लग जाते।
हमारी मुलाकातें दफ्तर से बाहर भी निकलने लगीं। संकोच की मुस्कुराहट, ठहाके में गुंजने लगे। महीने कब साल में बदले और दोस्ती खास होते हुए इश्क़ में तब्दील हो गई।

घंटों मरीन ड्राइव पर ढलती रात में समुंदर की लहरों को देखते हुए अपने आने वाले कल को बुनते थे।
शादी के बाद फेमिली प्लानिग की बातें घंटो हुआ करती थीं। बच्चों के नाम से लेकर उनकी संख्या तक। मेरे घर में तो सब राज़ी हैं और उसके घर पर सब हमारी शादी के लिए तैयार हैं, ये बात उसने जाने कितनी दफ़ दोहराई है।

ज़िंदगी कितनी खूबसूरत लग रही रही थी। अच्छी कंपनी में नौकरी तो थी ही और अब मनचाहा हमसफर भी मिल गया।

दिबाकर और निहारिका ने मलाड वेस्ट में एक टू बीएचके फ्लैट भी देख रखा था। सगाई के बाद उसे बुक करवाया जाएगा और शादी के बाद शिफ्ट हो जाएंगे।

उस फ्लैट को घर में तब्दील करने के लिए, मनमाफिक रंग से रंगवाएंगे। कौन-सा कोना पढ़ने-लिखने के लिए होगा, किस कोने में चाय की चुस्कियां ली जाएंगी। फर्नीचर कैसे होंगे। यानी कुल मिलाकर इंटीरियर की रॉ प्लानिंग दोनों ने पहले से ही तैयार कर ली थी।

चार साल के अफेयर के बाद फाइनली आज सगाई होने जा रही है। निहारिका का पूरा परिवार, दोस्त सब जमा हो गए हैं, बस दिबाकर का इंतजार है। पंडित जी भी तैयार हैं।

रिंग सेरेमनी के लिए 6 बजे का समय है, उससे पहले छोटी सी पूजा है।
निहारिका ने फिर से पूछा देबू आया। दिबाकर को वो देबू कहती थी। जवाब में "ना" सुनकर, खुद ही कह गई। क्सा करेगा, ट्रैफिक भी तो जानलेवा है। ऊपर से वो घबराता भी तो बहुत है। आ ही रहा होगा।

घड़ी में चार से पांच बज गए, देबू का कोई पता नहीं। निहारिका को अब बैचेनी होने लगी है, उसका मोबाइल मां ने छीन लिया था, वरना वो फेसबुक या ट्विटर में उलझ जाती। निहारिका ने अपनी बेस्ट फ्रेंड अनन्या से कहा,'' अनु देबू से पूछ तो कहां तक पहुंचा है, मुहुर्त निकला जा रहा है"।
अनु ने कॉल किया। कुछ देर बाद अनु के चेहरे के रंग ही बदलने लगे। क्या, क्यूं और अभी इस वक़्त।।।
निहारिका के दिल की धड़कने तेज हो गईं, क्या हुआ अनु, बोल ना।

अनु जड़वत खड़ी थी, निहारिका ने फोन छीन कर हैलो बोला, उधर से दिबाकर ने कहा, "सॉरी"....क्या, क्यों सॉरी। अरे आ जाओ। ट्रैफिक में देर हो जाती है। मैं सबको समझा दूंगी। आ जाओ। तभी पीछे से रेलवे अनाउमसमेंट सुनाई दी।
घबराते हुए निहारिका ने कहा, " कहां हो तुम????"
"दिल्ली जा रहा हूं"...
वहां क्यों????
निहारिका, मुझे माफ़ कर दो। मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता। मैं दिल्ली जा रहा हूं। इस समय मैं अपने करियर को शेप देना चाहता हूं। तुमसे शादी नहीं कर सकता। मैं कई दिनों से कहना चाह रहा थी, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया।

निहारिका के हाथ से मोबाइल गिर गया। उसकी आंखों के सामने एक झटके में सभी बीते पल घूम गए। कान के पास जैसे विस्फोट हुआ हो, सायं सायं की झनझनाहट हो रही थी और बस एक सवाल कि पलायन करना था, तो आगे क्यों बढ़ा?...करियर के लिए आज का दिन ही सोचने को मिला?... रज़ामंदी तो थी न या फिर....

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