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बिछड़ना

मिले तो थे, बिछड़ने के वादे के साथ, फिर क्यों वो तेरा पहली बार अपना कहना याद आता है, क्यों वो तेरा हाथ छुड़ा कर जाना याद आता है। बढ़ चुके हैं हम आगे, फिर क्यों तेरा पीछे छूट जाना य...

पलायन

चित्र
जानें वो बातों का कौन-सा सिरा खोलता था कि स्वेटर की तरह सारे फंदे उधड़ने लग जाते। हमारी मुलाकातें दफ्तर से बाहर भी निकलने लगीं। संकोच की मुस्कुराहट, ठहाके में गुंजने लगे। महीने कब साल में बदले और दोस्ती खास होते हुए इश्क़ में तब्दील हो गई। चित्र - इंटरनेट से साभार ख़ुद को आईने में पार्लर से आने के बाद जाने कितनी दफा निहार चुकी है। कभी लट को एक तरफ करती है, तो कभी टच अप करने लग जाती है। प्रजेंटेबल रहना उसकी आदत है, लेकिन आज की बात ही अलग है। उसके रूप श्रृंगार में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। खुद को निहारने के अलावा निहारिका बार बार पूछे जा रही थी "वो आ गए"... प्रतिउत्तर में "ना" सुन होंठों को भीचकर कुछ देर बैठ जाती। फिर कहती कि ट्रैफिक भी तो है, बेचारे कहीं फंस गए होंगे। घर में चहल पहल थी, हर तरफ सब व्यस्त ही नजर आ रहे थे और निहारिका गुजरे पलों में पहुंच गई। जब वो पहली बार दिबाकर से मिली थी। पहली बार वो दफ्तर में नया आया था। शांत रहता था। कम बोलने वाला, कुछ संकोची सा लड़का। शुरू में देख कर लगा, हुंह क्या अजीब प्राणी है, न हाय न हैलो। मुर्गी के दड़बे सरीखे अपने क्यूबिक...