मुझे बुरा क्यों लगा ?
नरगिस फाखरी। अदाकारा हैं। अमेरिका की रहने वाली हैं। बॉलीवुड फिल्मों में काम करती हैं। खुलकर बोलती हैं (ऐसा मेरा पत्रकार साथियों का कहना है)। ख़ैर, हाल ही में उनसे मुलाक़ात हुई। अभिनेता रितेश देशमुख और उनकी जोड़ी वाली फिल्म ‘बैंजो’ के सिलसिले में यह मुलाक़ात हुई।
| नरगिस फाखरी |
भई, अमेरिका की रहने वाली हैं मोहतरमा, फिर ऐसी गुज़ारिश लाज़िमी भी है। लेकिन जाने क्यों उनकी ये गुज़ारिश मुझे खटकी। फिल्में तो आप हिन्दी ही करती हैं।
यदि मैं ग़लत नहीं हूं, तो साल 2011 में इम्तियाज़ अली की फिल्म ‘रॉकस्टार’ से आपने बॉलीवुड में अपने सिनेमाई करियर की शुरुआत की थी। उसके बाद ‘मद्रास कैफ़े’, ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ और ‘मैं तेरा हीरो’ समेत दर्ज़नों फिल्मों का हिस्सा रहीं। आपको इस इंडस्ट्री में काम करते हुए छह साल हो गए। फिर भी हिंदी को लेकर आपका ये बर्ताव, मुझे रास नहीं आया।
अब कहने वाले तो यह भी कहेंगे कि मैडम आप भी अंग्रेज़ी में सिद्धहस्त तो नहीं हैं। लेकिन, सच मानिए यदि मुझे अंग्रेज़ी अख़बार में काम करना होता, तो मैं वाकई सिद्धहस्त होती। फिर भी मैंने कभी अंग्रेज़ी को हेय दृष्टि से नहीं देखा है। ये दीगर बात है कि अंग्रेज़ी बोलने वाले, भले ही ग़लत बोल रहे हों, उनकी इज़्जत थोड़ी ज़्यादा ही की जाती है।
ख़ैर, हम मुद्दे से भटक रहे हैं। बात भाषा पर आ गई, तो जज़्बाती हो गई। नरगिस मैडम यही नहीं थमी, भारत के प्रति अपने प्रेम की पुढिया लगातार खोलती रहीं। कभी उन्हें मसालेदार भोजन से आपत्ति थी, तो कभी शोर से, कभी ट्रैफिक से, तो कभी वर्क कल्चर से दिक्क़तें।
ओफ्फ़ो, मैडम जी, हम हिंदूस्तानियों की फितरत क्या कहें, जो हमे गरियाएगा, भला-बुरा कहेगा, उसे ही हम श्रेष्ठ बोलकर सिर पर बैठाएंगे। आपकी एक भी बात ग़लत नहीं है। छोटे कपड़े पहने लड़की दिख जाए, तो कुछ की आंखें बंद होना ही भूल जाती हैं। भीड़ भी बहुत है और शोर भी काफी है। यहां के खाने में भी खूब मसाले डाले जाते हैं, क्या करें हमारे कल्चर में उबला खाना बीमारों के लिए रिज़र्व है। खिचड़ी भी अकेले नहीं खा पाते। उसे खाने के लिए दही, पापड़, खी और अचार खोजते हैं। इन बातों के अलावा जो एक बात आपने और बोली कि ‘यहां के लोग फ्रेंडली हैं’। जी, यहां के लोग वाकई फ्रेंडली हैं, तभी तो कईयों को न सिर्फ़ रोजी-रोटी दे रहे हैं, बल्कि उन्हें एक पहचान भी देते हैं। ताकि, वो इतरा सके।
आपकी कही सारी सच्ची बातें, मैं मानती हूं, लेकिन जाने क्यों आपका कहा मुझे बुरा लगा।
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