महज 'ख़बर' बन गईं तुम
खुला खत - प्रत्यूषा के नाम,
डियर प्रत्यूषा, अब तुम वहां हो, जहां न तो किसी की सदाएं सुनाई देंगी और न ही तुम्हारी कोई ख़बर तुम्हारे अपनों तक ही आ पाएगी। ख़ुद को ख़त्म करने का फैसला यक़ीनन तुमने काफ़ी सोचने के बाद ही लिया होगा। जब तुम इस फैसले पर अमल कर रही होगी, तब ख़ुद पर गुस्सा भी आया होगा और कुछ कोफ़्त भी ऊपर वाले पर हुआ होगा ।
| प्रत्युषा बनर्जी |
अब तो तुम चली गईं, लेकिन ज़िंदगी इतनी बुरी भी नहीं होती कि उसे जिया न जा सके।
फ़ैसले कभी ग़लत या सही नहीं होते, उनके नतीज़े ही सब तय करते हैं। तुम्हारे जाने के बाद कई रो रहे हैं, कुछ अफसोस जता रहे हैं, तो कोई मीडिया के सामने आने का एक मौक़ा भुना रहा है। तुम्हें जो करीब से नहीं भी जानता, वो सब तुम्हारे वर्तमान से भूतकाल के ब्यौरे दे रहे हैं। कई समीकरण सामने आ रहे हैं। लेकिन उन चार जोड़ी आंखों से बहते आंसू को कोई नहीं देख रहा है। कोई उनकी परवाह भी नहीं कर रहा है। अरे वही, जिन्हें दुनिया तुम्हारे माता -पिता के नाम से जानती है। ठीक ही तो है, जब तुमने उनकी कोई परवाह नहीं की, तो भला दुनिया क्यों परवाह करेगी।
मशहूर धारावाहिक में केंद्रिय भूमिका से शुरुआत हुई और घर घर में पहुंचीं और सबके दिलों में पहुंच गईं। जमशेदपुर से तुम कई सपने लेकर आई थीं, शुरू में वो सच भी तो हुए। क्या हुआ, अगर थोड़ी सी अड़चने आईं। तुम तो बड़ा नाम बनने आई थीं, खुद को साबित करने आई थीं, लेकिन यह क्या तुम तो एक 'सनसनीखेज़ ख़बर' बन गई । महज 'ख़बर'।
हमने 'आनंदी' को सिर्फ़ देखा है, तुमने तो उसे जिया है। सब सहने के बाद भी 'आनंदी' हार नहीं मानती थी, लेकिन तुम तो यूं बिखरीं कि खुद उठ भी न पाई। इतनी कमज़ोर तो यक़ीनन तुम नहीं थीं। वो एक लम्हा शायद तुम पर भारी पड़ गया। तुम अपने किरदार सी क्यों न हो पाईं। 'आनंदी' को प्रत्युषा ने निभाया था, तो प्रत्युषा में कुछ तो 'आनंदी' का होगा न। क्या कलाकार के भीतर थोड़ा सा भी किरदार नहीं आ पाता।
जाना था और तुम चली भी गईं, लेकिन यूं जाना, कुछ सही नहीं लगा। जीने से पहले 'मृत्यु' का वरण, दुखद है।
फिलहाल जाने क्यों मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक़ का एक शेर याद आ रहा है -
'अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे,
मर गए पर न लगा जी, तो किधर जाएंगे।
सामने चश्म - ए - गुहरबार के, कह दो, दरिया,
चढ़ के अगर आए, तो नज़रों से उतर जाएंगे। '
समीकरणों के जुनून पर सवार पत्रकार कई कहानियां बना रहे हैं। कोई 'आत्महत्या' तो कोई 'हत्या' कह रहा है। कल से सिर्फ़ ख़बरें पढ़ रही हूं।
...और दुआ मांग रही हूं कि तुम जहां भी रहो, तुमको शांति मिले। ओम शांति।
फ़ैसले कभी ग़लत या सही नहीं होते, उनके नतीज़े ही सब तय करते हैं। तुम्हारे जाने के बाद कई रो रहे हैं, कुछ अफसोस जता रहे हैं, तो कोई मीडिया के सामने आने का एक मौक़ा भुना रहा है। तुम्हें जो करीब से नहीं भी जानता, वो सब तुम्हारे वर्तमान से भूतकाल के ब्यौरे दे रहे हैं। कई समीकरण सामने आ रहे हैं। लेकिन उन चार जोड़ी आंखों से बहते आंसू को कोई नहीं देख रहा है। कोई उनकी परवाह भी नहीं कर रहा है। अरे वही, जिन्हें दुनिया तुम्हारे माता -पिता के नाम से जानती है। ठीक ही तो है, जब तुमने उनकी कोई परवाह नहीं की, तो भला दुनिया क्यों परवाह करेगी।
मशहूर धारावाहिक में केंद्रिय भूमिका से शुरुआत हुई और घर घर में पहुंचीं और सबके दिलों में पहुंच गईं। जमशेदपुर से तुम कई सपने लेकर आई थीं, शुरू में वो सच भी तो हुए। क्या हुआ, अगर थोड़ी सी अड़चने आईं। तुम तो बड़ा नाम बनने आई थीं, खुद को साबित करने आई थीं, लेकिन यह क्या तुम तो एक 'सनसनीखेज़ ख़बर' बन गई । महज 'ख़बर'।
हमने 'आनंदी' को सिर्फ़ देखा है, तुमने तो उसे जिया है। सब सहने के बाद भी 'आनंदी' हार नहीं मानती थी, लेकिन तुम तो यूं बिखरीं कि खुद उठ भी न पाई। इतनी कमज़ोर तो यक़ीनन तुम नहीं थीं। वो एक लम्हा शायद तुम पर भारी पड़ गया। तुम अपने किरदार सी क्यों न हो पाईं। 'आनंदी' को प्रत्युषा ने निभाया था, तो प्रत्युषा में कुछ तो 'आनंदी' का होगा न। क्या कलाकार के भीतर थोड़ा सा भी किरदार नहीं आ पाता।
जाना था और तुम चली भी गईं, लेकिन यूं जाना, कुछ सही नहीं लगा। जीने से पहले 'मृत्यु' का वरण, दुखद है।
फिलहाल जाने क्यों मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक़ का एक शेर याद आ रहा है -
'अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे,
मर गए पर न लगा जी, तो किधर जाएंगे।
सामने चश्म - ए - गुहरबार के, कह दो, दरिया,
चढ़ के अगर आए, तो नज़रों से उतर जाएंगे। '
समीकरणों के जुनून पर सवार पत्रकार कई कहानियां बना रहे हैं। कोई 'आत्महत्या' तो कोई 'हत्या' कह रहा है। कल से सिर्फ़ ख़बरें पढ़ रही हूं।
...और दुआ मांग रही हूं कि तुम जहां भी रहो, तुमको शांति मिले। ओम शांति।
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