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लाल डायरी के नीले हर्फ़ !

कुशल नटनी-सी अपने काम में जुटी हुई शुभ्रा का दिन सबसे पहले आता है और रात सबसे आख़ि‍र में उसे नसीब होती है। कहने को वो सिर्फ़ ‘गृहणी’ है। यह  शब्द भी क्या ख़ूब है?... 'जिम्मेदारी' महज एक लफ़्ज़ है या उससे कुछ ज़्यादा। इसका अंदाज़ा तो जिम्‍मेदारियों को ढ़ोने वाला ही बता सकता है। सभी के हिस्‍से यह शब्‍द 'जिम्‍मेदारी' आता ही है। कोई जिम्‍मेदारी निभाता भर है और किसी की ज़ि‍ंदगी जिम्‍मेदारियों में ही गुजर जाती हैं। उन्‍हीं लोगों में आती है शुभ्रा। शुभ्रा, एक गृहणी है। घर संभालने से लेकर रिश्तों को सहेजना, सब कुछ उसके जिम्मे आता है। इस जिम्मेदारी को बिना किसी शि‍क़ायत के बीते बीस सालों से निभा रही है। हां, कभी-कभी माता जी का झुर्रियों भरा हाथ शुभ्रा के सिर पर जाता है और दुलारते हुए कहती हैं, “तू तो मेरी लक्ष्मी है। मेरे परिवार की बगिया को तूने महका रखा है। एकदम कुशल गृहणी है री तू तो”। माता जी के इस आशीष में पिता जी भी सहभागी बन जाते थे। झट से अपना बखान करते हुए कहते, “आख़ि‍र पसंद किसकी थी। मैंने ही तो शुक्ला जी से शुभ्रा का हाथ मांगा था, गुड्डू के लिए”। तारीफ़ की इतनी-सी...