Bachapan
बचपन कहीं से कोई मेरा बचपन ला दे, पिछले चौराहे की दूसरी मोड़ वाली गली पर है शायद, यूँ ही बिना बात के मुँह गुब्बारे जैसे फुला लेती थी, और जरा सी ठुनकी पर खुद ही मान जाती, खेल में बेमानी के नाम पर रूठकर दूसरे कोने में बैठ जाती थी, अपनी बात मानते देख फिर से खिलखिला दिया करती थी, कच्ची अमिया, रसीली इमली के साथ बर्फ़ के गोले के वो ठेले, सब कुछ कितना छोड़ आई हूँ मैं वहां उस मोड़ पर, समझदारो की संगत लेकर वो ही नासमझी की दुनिया मुझे दे दो, थी प्यारी मेरी दुनिया, क्या खूब थे मेरे वो संगी साथी, बारिश में सड़कों में जमा पानी को पावों से उछालना, डांट पड़ने पर आँखों से सावन भादो बरसना, कितना कुछ था उस प्यारे बचपन में, जब से बड़ी हुई हूँ, असल में जीना छूट गया है, इस बड़प्पन में सब कुछ नापा तुला सा हो गया है, बेहिसाब सा जीने का वो अंदाज़ मुझे लौटा दो, यु झूठी मुस्कराहट जुटी तारीफे नहीं ज़रिरत हैं इनकी मुझे, मेरी सच्चाई अच्छे ही मुझे लौटा दो,