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अप्रैल, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Bachapan

बचपन  कहीं से कोई मेरा बचपन ला दे, पिछले चौराहे की दूसरी मोड़ वाली गली पर है शायद, यूँ ही बिना बात के मुँह गुब्बारे जैसे फुला लेती थी, और जरा सी ठुनकी पर खुद ही मान जाती, खेल में बेमानी के नाम पर रूठकर दूसरे  कोने में  बैठ जाती थी, अपनी बात मानते देख फिर से खिलखिला दिया करती थी, कच्ची अमिया, रसीली इमली के साथ बर्फ़ के गोले के वो ठेले, सब कुछ कितना छोड़ आई हूँ मैं वहां उस मोड़ पर, समझदारो की संगत लेकर वो ही नासमझी की दुनिया मुझे दे दो, थी प्यारी मेरी दुनिया, क्या खूब थे मेरे वो संगी साथी, बारिश में सड़कों में जमा पानी को पावों से उछालना, डांट पड़ने पर आँखों से सावन भादो बरसना, कितना कुछ था उस प्यारे बचपन में, जब से बड़ी हुई हूँ, असल में जीना छूट गया है, इस बड़प्पन में सब कुछ नापा तुला सा हो गया है, बेहिसाब सा जीने का वो अंदाज़ मुझे लौटा दो, यु झूठी मुस्कराहट जुटी तारीफे नहीं ज़रिरत हैं इनकी मुझे, मेरी सच्चाई अच्छे ही मुझे लौटा दो,

जि़न्दगी

या मौला कुछ ऐसी जि़न्दगी दे मुझे, चुटकी भर नमक...कुछ बूँदें शहद की, कुछ लम्हें मोहब्बत के...चंद लम्हात शिकायतों के, चंद ताने बेगानों के...ज़रा सी झिड़की अपनों की,

शब्‍दों का फर्क और जहन की बात.. कशमकश

जहन ए इवारत है ये या इवारत ए जहन फर्क शब्‍दों के हेर फेर का या जहन का कथन.... 

इबारत-ए-ज़हन

ज़हन का पन्ना मेरा भी  कुछ इबारत मेरे ज़हन की, कुछ लफ्ज़ मेरे ज़ेहन के, कुछ मेरे जज्बात, कुछ मन के सवाल, कुछ उन सवालों के जवाब, कुछ बाते मेरे ज़ेहन से…