मुकदमा
कभी ऐसा भी करो, बिठाओ एक अदालत, चलाओ खुद पर मुकदमा, वादी भी तुम, प्रतिवादी भी तुम, दागो तीखे सवाल, खोलों आरोपों के सिरे, मन के कटघरे में खड़े तुम, करते रहो जिरह, फिर देखो मिलता है कारावास, या हो जाते हो मुक्त। ©
शब्दों का फर्क और ज़हन की बात.. कशमकश