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माफी

कई बार मांगी है माफी, किसी को लगी ठेस, कभी हुई कोई भूल, वजह, बेवजह ही मांग लेती हूं, कभी दोस्तों से, कभी अपनों से और कई बार अजनबियों से भी, माफी मांगने की इस कड़ी में खुद को अनदेखा किया, नहीं मांगी कभी खुद से माफी, अपने सपनों की कली को खिलने से पहले तोड़ने की माफी, औरों के लिए बोलती रही खुद के लिए चुप्पी साधने की माफी, अपना मन-समय उन्हें देने के लिए, जिन्हें कभी कद्र नहीं थी, तो सुनो "स्व" तुमसे मांगती हूं माफी, अब से स्वयं को रखूंगी पहले, लड़ूंगी खुद के लिए, अपने सपनों के लिए, और अपने आत्मसम्मान के लिए। © #पंक्ति #श्वेता

वो तुम ही हो ...

वो तुम हो जिसकी कोख में की हलचल, हृदय पर अंकित हुई, वो तुम ही हो, जिसकी "किक्स" ने सिर्फ मुझे नहीं, मेरी आत्मा के भीतर तक को जगाया, वो तुम ही हो, जो मेरे भीतर आकार लेती रहीं,  और बाहर से कुछ-कुछ मैं भी पनपती रही, वो तुम ही हो, जिसका अजनबी अस्तित्व भी, जन्म-जन्मांतर का साथ होने की गवाही देता रहा, वो तुम ही हो, जिसने बताया कि मेरी देह कितनी करिश्माई है,  जिसमें एक नये शख्स को गढ़ने की क्षमता है, वो तुम ही हो, जिसको देख कर मेरी धड़कनें तेज हो गईं थी,  और सांस लेना भूल ही गई, वो तुम ही हो, जिसने बताया कि प्रेम में, मैं कितनी गहरी उतर सकती हूं, वो तुम ही हो,  जिसने इस संसार का सबसे सुंदर रिश्ता मुझे दिया, तुमने "मां" कहा और मैं पिघल कर आंखों से झरने लगी,  वो तुम ही हो, जो एक पल में मुझे आत्मविश्वास से भर देती हो, और अगले पल कई सारी आशंकाओं से घिर जाती हूं,  तुम आईं, बहुत कुछ बदला,  लेकिन सबसे ज्यादा मैं बदली।