इक मुलाक़ात
एक भूली-बिसरी ख़्वाहिश अचानक टकरा गई, टकटकी लगाए निहारती रही, फिर बाजू पकड़ बैठा लिया। फिर खुला उसक शिक़ायती पिटारा, एक के बाद एक उलाहनों का दौर शुरू हुआ। बातों का सिलसिला कुछ यूं चला, के वक़्त फिसलने लगा और हम ठहर गए। कभी भूल जाना, तो कभी हाथ छुड़ा लेना, जाने कितना कुछ कहना था उसे। आंखें निकाल डपटती मुझे, फिर नम आंखें लिए सिसकती। ज़िन्दगी में आगे जाने की हसरत में, न जाने कितने मोड़ों पर कुछ ख़्वाहिशें पीछे छूट जाती हैं। अबकी कोई ख़्वाहिश टकराये, तो झट से उठा कर सीने से लगा लेना। चुपचाप कुछ वक़्त उसके साथ गुज़ार लेना, फिर ज़रूर मिलेंगे का वादा कर देना।