मेरी ख़्वाहिशें...
उफ्फ़! ये बेअदब ख़्वाहिशें,कैसे मुंह चिढ़ाकर, बिदक जाती हैं, ...और हम इनकी बांह पकड़ खींच लाते हैं। जिद्दी सी पिद्दी सी ख़्वाहिशें, नखरीली, ठिठकी सी दूर बैठी हैं, छुओ तो पिघल जाती हैं, पास न जाओ, तो बुरा मान जाती हैं। नटखट शैतान सी मेरे आजू-बाजू घूमती रहती हैं, अपने वजूद का अहसास कराती हैं, और मानो कहती हैं, हम हैं, तो तुम हो। कभी पक्की सहेली सी, कभी पिद्दी अकेली सी ख़्वाहिशें।